अमेठी। उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में बेसिक शिक्षा विभाग के भीतर हुए छह करोड़ रुपये से अधिक के बहुचर्चित गबन मामले की जांच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) करेगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक शिक्षक की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बड़ा फैसला सुनाया है। इसके साथ ही अदालत ने विभाग द्वारा की जा रही रिकवरी (वसूली) के आदेश पर भी अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
हाईकोर्ट सख्त, डीएम से मांगा व्यक्तिगत शपथपत्र
न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कई कड़े निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि:
"जब किसी मामले में पहले से ही आपराधिक एफआईआर दर्ज है, तब कथित गबन की रकम की वसूली भू-राजस्व (Land Revenue) की तरह जबरन नहीं की जा सकती। इसके लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।"
हाईकोर्ट ने अमेठी के जिलाधिकारी (डीएम) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा है कि आखिर किस कानूनी प्रावधान के तहत इस वसूली का आदेश जारी किया गया था। अदालत ने सीबीआई (लखनऊ) के संयुक्त निदेशक को तुरंत केस डायरी और सभी दस्तावेज अपने हाथ में लेने तथा अगली सुनवाई (10 अगस्त) तक स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।
शिक्षकों और कर्मियों के खातों में पहुंचे करोड़ों रुपये
शुरुआती विभागीय जांच में यह घोटाला ₹3.13 करोड़ का नजर आ रहा था, जो बाद में बढ़कर ₹4.34 करोड़ हुआ और अब इसके 6 करोड़ रुपये से अधिक होने की आशंका है। यह पूरा खेल अवशेष देयक, सामान्य भविष्य निधि (GPF) और बीमा भुगतान की राशि में हेराफेरी करके खेला गया।
जांच में सामने आया कि शिक्षा विभाग के वित्त एवं लेखा कार्यालय और कोषागार (Treasury) के अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी धन सीधे निजी खातों में ट्रांसफर किया गया:
- शिक्षक श्रवण कुमार द्विवेदी: के खाते में ₹77.06 लाख भेजे गए।
- शिक्षक शैलेश चंद्र शुक्ल: के खाते में ₹47.42 लाख पहुंचे।
- अन्य राशि: लेखा विभाग के लिपिकों (क्लर्क) और आउटसोर्सिंग कर्मियों के खातों में ट्रांसफर की गई।
अदालत ने अंदेशा जताया है कि भ्रष्टाचार का यह तरीका सूबे के अन्य जिलों में भी अपनाया गया हो सकता है, इसलिए इसकी निष्पक्ष और व्यापक जांच बेहद जरूरी है।


