नई दिल्ली। स्कूली शिक्षा को अधिक प्रभावी और समाज से जुड़ा बनाने की दिशा में केंद्र सरकार एक बड़ा बदलाव करने जा रही है। प्रस्तावित नई व्यवस्था के तहत स्कूलों के संचालन की पूरी जिम्मेदारी समाज को सौंपने की तैयारी है, जबकि सरकार की भूमिका वित्तीय सहायता और नीतिगत सहयोग तक सीमित रहेगी।
यह कदम समग्र शिक्षा अभियान के तहत एक नए चरण की शुरुआत माना जा रहा है। इसका उद्देश्य वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता, पहुंच और सामाजिक भागीदारी को मजबूत करना है।
समाज निभाएगा मुख्य भूमिका
प्रस्ताव के अनुसार, स्कूलों के दैनिक संचालन, निगरानी और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेने में समाज के प्रबुद्ध वर्ग, अभिभावक, शिक्षाविद और स्थानीय संस्थाएं अहम भूमिका निभाएंगी। इसके लिए स्कूल स्तर पर समितियों के गठन की योजना है, जो शिक्षा व्यवस्था को जमीनी स्तर से मजबूत करेंगी।
सरकार देगी संसाधन और दिशा
सरकार स्कूलों के लिए वेतन, बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षण और नीतिगत मार्गदर्शन उपलब्ध कराएगी। शिक्षा मंत्रालय का मानना है कि इससे स्कूलों में जवाबदेही बढ़ेगी और स्थानीय जरूरतों के अनुसार समाधान संभव हो सकेंगे।
सीखने के स्तर पर फोकस
नई व्यवस्था का लक्ष्य केवल परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि लर्निंग आउटकम सुधार, ड्रॉपआउट दर कम करना और 100 प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित करना है। मंत्रालय का कहना है कि सामाजिक सहभागिता से बच्चों की पढ़ाई में निरंतरता और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा।
नीति के अनुरूप बड़ा बदलाव
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के लागू होने के पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं और समग्र शिक्षा अभियान का मौजूदा चरण 31 मार्च 2026 को समाप्त होने जा रहा है। मंत्रालय इस बदलाव को शिक्षा सुधारों की अगली बड़ी कड़ी मान रहा है।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह मॉडल सही तरीके से लागू होता है, तो स्कूल शिक्षा में सामाजिक जुड़ाव और गुणवत्ता दोनों को नई दिशा मिल सकती है।


