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उत्तर प्रदेश में शिक्षक भर्तियाँ अर्हता विवाद में फंसी! बीएड, एलटी ग्रेड और एडेड प्रधानाध्यापक भर्ती पर पेच

Sir Ji Ki Pathshala

अर्हता पर अटकी भर्तियाँ: शिक्षकों की नियुक्तियों में नई पेचिदगियाँ, हजारों अभ्यर्थी नैराश्य में

प्रयागराज। शैक्षिक अर्हताओं को लेकर जारी विवाद ने उत्तर प्रदेश की शिक्षण भर्तियों को फिर से ठहराव पर ला खड़ा किया है। जिम्मेदार विभागों की अनदेखी और अस्पष्ट नियमावली से हजारों बेरोजगार अभ्यर्थियों को असमंजस और नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। विभिन्न स्तरों की भर्तियों में अर्हता तय न हो पाने के कारण अब नियुक्ति प्रक्रियाएँ लटक कर रह गई हैं।

बीएड असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती पर दो बार रोक

अशासकीय सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में विज्ञापन संख्या–51 के अंतर्गत बीएड विषय के 107 पदों की भर्ती सबसे बड़ा मामला बन चुका है।
2022 में उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग ने विज्ञापन जारी किया था, लेकिन अर्हता विवाद के चलते इसे निरस्त करना पड़ा। बाद में नवगठित चयन आयोग ने दोबारा विज्ञापन जारी किया, किंतु अर्हता विवाद फिर कायम रहा।


एनसीटीई अधिनियम 2014 के अनुसार संशोधित अर्हता जोड़ने के बाद आयोग ने दूसरा विज्ञापन भी निरस्त करते हुए आगे की कार्यवाही रोक दी। दो आयोगों द्वारा विज्ञापन जारी होने के बावजूद योग्यता तय न हो पाना कई सवाल खड़े करता है।

एलटी ग्रेड कंप्यूटर भर्ती में बीएड की अनिवार्यता पर टकराव

राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में एलटी ग्रेड कंप्यूटर विषय की भर्ती में भी अर्हता बड़ा विवाद बन गई है। सरकार ने 28 मार्च 2024 को जारी गजट में बीएड को अनिवार्यता से मुक्त कर दिया, जबकि एनसीटीई की गाइडलाइन अब भी बीएड को आवश्यक बताती है।

बीएड धारक अभ्यर्थियों ने इस विसंगति को लेकर अदालत का रुख किया है। मामला वर्तमान में हाईकोर्ट में विचाराधीन है, जिससे भर्ती प्रक्रिया ठप की ठप पड़ी है।

जूनियर एडेड में प्रधानाध्यापक भर्ती पर नया अनुमोदन पेच

एडेड जूनियर हाईस्कूलों में प्रधानाध्यापक पदों की भर्ती भी नए विवाद में घिर गई है। शासनादेश में यह स्पष्ट नहीं था कि वित्तविहीन विद्यालयों के अनुभव प्रमाणपत्र को बीएसए से अनुमोदित करवाना आवश्यक है या नहीं। बाद में बेसिक शिक्षा निदेशक प्रताप सिंह बघेल ने बीएसए अनुमोदन अनिवार्य कर दिया, जिससे हालात उलझ गए।

अगर बीएसए अनुमोदन की बाध्यता लागू होती है तो प्रधानाध्यापक के 253 पद भरना कठिन होने की आशंका जताई जा रही है। कई अभ्यर्थी अब दस्तावेजों की वैधता को लेकर असमंजस में हैं।

अभ्यर्थियों पर अनिश्चितता का बोझ

लगातार भर्तियों के निरस्त होने और अर्हता विवादों के चलते अभ्यर्थियों में रोष और निराशा बढ़ रही है। वर्षों की तैयारी, फॉर्म शुल्क और समय खर्च के बाद भी उन्हें स्पष्ट दिशा नहीं मिल पा रही है।

समन्वय की कमी से भर्ती व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न

शिक्षण भर्तियों में बार-बार नियम बदलने, अधूरी अधिसूचनाओं और विभागीय समन्वय की कमी ने चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जब तक केंद्र — राज्य — आयोगों — नियामक संस्थाओं के बीच एकरूप अर्हता नीति नहीं बनेगी, तब तक विवाद और रुकावटें खत्म होना कठिन है।