लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश के परिषदीय, सहायता प्राप्त, राजकीय, कंपोजिट एवं कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में विद्यालय प्रबंध समिति (School Management Committee - SMC) के पुनर्गठन के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act-2009) एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत उत्तर प्रदेश के परिषदीय एवं मान्यता प्राप्त विद्यालयों में सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देने और मजबूत बनाने के उद्देश्य से नवंबर 2026 में नई विद्यालय प्रबंध समितियों का गठन किये जाने संबंधी निर्देश शासन द्वारा जारी किए गए हैं।
वर्तमान विद्यालय प्रबंध समितियों (SMC) का कार्यकाल 30 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। इसके बाद 1 नवंबर से 30 नवंबर 2026 के बीच नई विद्यालय प्रबंध समितियों का गठन किया जाएगा, जो 1 दिसंबर 2026 से अपना कार्यभार संभालेंगी।
विद्यालय प्रबंधन समिति (SMC) क्या है?
विद्यालय प्रबंधन समिति विद्यालय, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय के बीच समन्वय स्थापित करने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था है। इसका उद्देश्य विद्यालयों की शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार, बच्चों के नामांकन एवं उपस्थिति बढ़ाना, विद्यालय विकास योजनाओं का निर्माण तथा सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी करना है।
विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) गठन के प्रमुख उद्देश्य
नई गाइडलाइन के अनुसार विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) निम्नलिखित कार्यों पर विशेष ध्यान देगी—
- सभी बच्चों का शत-प्रतिशत नामांकन और नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना।
- ड्रॉपआउट बच्चों की पहचान कर उन्हें दोबारा विद्यालय से जोड़ना।
- विद्यालय विकास योजना (School Development Plan) तैयार करना।
- निपुण भारत मिशन एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षण को बढ़ावा देना।
- मध्यान्ह भोजन (PM POSHAN) सहित अन्य योजनाओं की निगरानी करना।
- विद्यालय में स्वच्छता, पेयजल, शौचालय एवं अन्य मूलभूत सुविधाओं का अनुश्रवण करना।
- विद्यालय के वित्तीय कार्यों में पारदर्शिता बनाए रखना।
- बच्चों के अधिकारों एवं सुरक्षित वातावरण को सुनिश्चित करना।
विद्यालय प्रबंध समिति में सदस्यों की संख्या
नई व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक विद्यालय प्रबंध समिति में कुल 15 सदस्य होंगे।
इनमें—
- 11 सदस्य विद्यालय में अध्ययनरत बच्चों के अभिभावक होंगे।
- 4 पदेन/नामित सदस्य होंगे, जिनमें स्थानीय निकाय का प्रतिनिधि, एएनएम, लेखपाल तथा प्रधानाध्यापक (सदस्य सचिव) शामिल होंगे।
समिति में कम से कम 50 प्रतिशत महिला सदस्य होना अनिवार्य होगा। साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं कमजोर वर्ग का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाएगा।
SMC अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चयन कैसे होता है?
विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) के गठन के बाद समिति के अध्यक्ष (Chairperson) और उपाध्यक्ष (Vice Chairperson) का चयन किया जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार यह चयन पूरी तरह लोकतांत्रिक और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होता है।
अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चयन
- SMC के गठन के बाद 11 अभिभावक सदस्यों में से ही अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चयन किया जाता है।
- प्रधानाध्यापक, एएनएम, लेखपाल या स्थानीय निकाय के सदस्य अध्यक्ष या उपाध्यक्ष नहीं बन सकते।
- चयन का पहला प्रयास सर्वसम्मति (Consensus) से किया जाता है।
- यदि सर्वसम्मति नहीं बनती, तो हाथ उठाकर मतदान कराया जाता है।
- मतदान में जिस अभिभावक सदस्य को सबसे अधिक मत मिलते हैं, उसे अध्यक्ष या उपाध्यक्ष चुना जाता है।
- यदि मतदान को लेकर विवाद या असहमति होती है, तो संबंधित अधिकारी की देखरेख में गोपनीय मतदान (Secret Ballot) कराया जा सकता है।
- अध्यक्ष या उपाध्यक्ष में से कम से कम एक पद पर महिला का होना अनिवार्य है।
अध्यक्ष की प्रमुख जिम्मेदारियां
- SMC की बैठकों की अध्यक्षता करना।
- विद्यालय विकास योजना (SDP) के निर्माण एवं क्रियान्वयन की निगरानी करना।
- विद्यालय में मिलने वाली सरकारी धनराशि के उपयोग की निगरानी करना।
- सदस्य सचिव (प्रधानाध्यापक) के साथ संयुक्त रूप से SMC बैंक खाते का संचालन करना।
- विद्यालय और अभिभावकों के बीच समन्वय स्थापित करना।
उपाध्यक्ष की भूमिका
उपाध्यक्ष, अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उनके सभी दायित्वों का निर्वहन करता है तथा समिति के कार्यों में अध्यक्ष का सहयोग करता है।
अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का कार्यकाल
अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का कार्यकाल SMC के कार्यकाल के समान होगा। वर्तमान दिशा-निर्देशों के अनुसार SMC का कार्यकाल 2 वर्ष निर्धारित है। यदि अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद किसी कारण से रिक्त हो जाता है, तो समिति नियमानुसार पुनः चयन की प्रक्रिया अपनाती है।
इस प्रकार SMC अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चयन अभिभावक सदस्यों द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है, जिससे विद्यालय के संचालन में अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) गठन की प्रक्रिया
नई समिति का गठन पूरी तरह पारदर्शी तरीके से किया जाएगा।
- प्रत्येक विद्यालय में खुली बैठक आयोजित होगी।
- बैठक की जानकारी पहले से अभिभावकों को दी जाएगी।
- बैठक में कम से कम 50 प्रतिशत अभिभावकों की उपस्थिति आवश्यक होगी।
- पहले सर्वसम्मति से चयन का प्रयास होगा।
- सहमति न बनने पर हाथ उठाकर मतदान कराया जाएगा।
- विवाद की स्थिति में गोपनीय मतदान कराया जा सकता है।
वित्तीय प्रबंधन कैसे होगा?
SMC के नाम से बैंक खाता संचालित होगा, जिसका संचालन अध्यक्ष और सदस्य सचिव के संयुक्त हस्ताक्षर से किया जाएगा।
सभी भुगतान PFMS एवं SNA-SPARSH प्रणाली के माध्यम से किए जाएंगे तथा वित्तीय अभिलेखों का नियमित रखरखाव और ऑडिट कराया जाएगा।
निर्माण कार्य की जिम्मेदारी
विद्यालयों में 30 लाख रुपये तक के निर्माण कार्य विद्यालय प्रबंधन समिति के माध्यम से कराए जा सकेंगे। इसके लिए अवस्थापना सुविधा उपसमिति का गठन किया जाएगा, जो निर्माण कार्यों की निगरानी करेगी।
कब समाप्त होगी सदस्यता?
निम्न परिस्थितियों में सदस्यता समाप्त मानी जाएगी—
- सदस्य की मृत्यु।
- न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि।
- स्थायी रूप से क्षेत्र छोड़ देना।
- लगातार चार बैठकों में अनुपस्थित रहना।
- संबंधित बच्चे का विद्यालय छोड़ देना।
रिक्त पदों पर नई खुली बैठक के माध्यम से सदस्य का चयन किया जाएगा।
मुख्य बातें:
- 1 से 30 नवंबर 2026 के बीच नई SMC का गठन होगा।
- वर्तमान समितियों का कार्यकाल 30 नवंबर 2026 तक रहेगा।
- प्रत्येक समिति में 15 सदस्य होंगे।
- कम से कम 50% महिला प्रतिनिधित्व अनिवार्य रहेगा।
- अध्यक्ष एवं सदस्य सचिव संयुक्त रूप से बैंक खाते का संचालन करेंगे।
- सभी भुगतान PFMS एवं SNA-SPARSH के माध्यम से होंगे।
- विद्यालय विकास, नामांकन, वित्तीय पारदर्शिता और योजनाओं की निगरानी SMC की प्रमुख जिम्मेदारी होगी।
- 1 दिसंबर 2026 से नई समितियां कार्यभार ग्रहण करेंगी।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी नई गाइडलाइन का उद्देश्य विद्यालय प्रबंध समितियों को अधिक सक्रिय, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। नई व्यवस्था के माध्यम से विद्यालयों में अभिभावकों की भागीदारी बढ़ेगी, योजनाओं के क्रियान्वयन में सुधार होगा और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षिक वातावरण उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी।
