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सुप्रीम कोर्ट की महिलाओं को 'शादी से पहले भरोसा न करने' की सलाह

शादी से पहले न करें भरोसा: सुप्रीम कोर्ट की महिलाओं को बड़ी सलाह | SC on Pre-marital Relations

नई दिल्ली: हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आधुनिक संबंधों और व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विवाह से पूर्व महिलाओं को पूरी तरह किसी पर भरोसा करने से बचना चाहिए, खासकर जब बात शारीरिक संबंधों की हो।

शादी से पहले न करें भरोसा: सुप्रीम कोर्ट की महिलाओं को बड़ी सलाह | SC on Pre-marital Relations

​यह मामला एक 30 वर्षीय महिला द्वारा दर्ज की गई शिकायत से जुड़ा था, जिसमें उसने आरोप लगाया कि एक युवक ने दिल्ली और दुबई में शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में पंजाब में किसी और से शादी कर ली।

​जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने इस पर विचार करते हुए कहा:

    • अजनबी का भाव: शादी से पहले लड़का और लड़की एक-दूसरे के लिए अजनबी ही होते हैं।
    • सतर्कता की आवश्यकता: पीठ ने कहा कि महिलाओं को बहुत सावधान रहना चाहिए और विवाह के वादे मात्र पर शारीरिक संबंध बनाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
    • पारंपरिक दृष्टिकोण: जस्टिस नागरत्ना ने सहजता से यह भी स्वीकार किया कि शायद उनके विचार "पुराने ख्यालों" वाले लग सकते हैं, लेकिन सुरक्षा और विश्वास के मामले में सावधानी सर्वोपरि है।

सामाजिक और कानूनी प्रभाव

​अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब "शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म" (False promise of marriage) के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि जहाँ एक ओर कानून महिलाओं को सुरक्षा देता है, वहीं कोर्ट की यह सलाह 'निवारक सावधानी' (Precautionary measure) के रूप में देखी जा रही है।

सबरीमाला और धार्मिक स्वतंत्रता पर बड़ी सुनवाई

​इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने एक और बड़े संवैधानिक मुद्दे पर कदम आगे बढ़ाया है। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर अब नौ जजों की संविधान पीठ सुनवाई करेगी।

  • सुनवाई की तिथि: यह अंतिम सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू होकर 22 अप्रैल तक चलेगी।
  • मुख्य मुद्दा: कोर्ट यह तय करेगा कि धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच का दायरा क्या है और क्या धार्मिक परंपराएं मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकती हैं।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट की ये दोनों गतिविधियां दर्शाती हैं कि न्यायपालिका न केवल व्यक्तिगत आचरण और सुरक्षा पर ध्यान दे रही है, बल्कि बड़े स्तर पर संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक प्रथाओं के बीच संतुलन बनाने की भी कोशिश कर रही है।